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॥ मंगलाचरण - लंकाकाण्ड ॥

॥ श्लोक ॥
रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं
योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्‌।
मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं
वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्‌॥ (१)
भावार्थ:- कामदेव के शत्रु शिव जी के द्वारा सेवित, जन्म-मृत्यु के भय को हरने वाले, काल रूपी मतवाले हाथी के लिए शेर के समान, योगियों के ईश्वर, ज्ञान के द्वारा जानने योग्य, गुणों की खान, अजेय, निर्गुण, निर्विकार, माया से परे, देवताओं के स्वामी, दुष्टों के वध को आतुर, ब्राहमणों के एकमात्र रक्षक, जल प्लावित मेघ के समान श्यामवर्ण, कमल के समान नेत्रों वाले, पृथ्वी के स्वामी के रूप में परमात्म स्वरूप श्रीरामचन्द्र जी की मैं वंदना करता हूँ। (१)

शंखेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं
कालव्यालकरालभूषणधरं गंगाशशांकप्रियम्‌।
काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं
नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शंकरम्‌॥ (२)
भावार्थ:- शंख और चंद्रमा के समान अत्यंत सुंदर शरीर वाले, शेर की खाल के वस्त्र धारण करने वाले, काल के समान भयानक सर्पों का भूषण धारण करने वाले, गंगा और चंद्रमा के प्रेमी, काशी के स्वामी, कलियुग के पापों का नाश करने वाले, कल्पवृक्ष के समान कल्याण करने वाले, गुणों के खान और कामदेव को भस्म करने वाले, पार्वती के पति परम वन्दनीय श्रीशंकर जी को मैं नमन करता हूँ। (२)

यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम्‌।
खलानां दण्डकृद्योऽसौ शंकरः शं तनोतु मे॥ (३)
भावार्थ:- जो संत पुरुषों को अत्यंत दुर्लभ कैवल्य मुक्ति देने वाले हैं और जो दुष्टों का संहार करने वाले हैं, ऎसे कल्याणकारी श्रीशंकर जी मेरा कल्याण करें। (३)

॥ दोहा ॥
लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड।
भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड॥ (१)
भावार्थ:- लव, निमेष, परमाणु, वर्ष, युग और कल्प जिनके प्रचण्ड बाण हैं और काल जिनका धनुष है, हे मन! तू उन श्रीराम जी का निरन्तर स्मरण क्यों नहीं करता है? (१)

॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥